समान नागरिक संहिता

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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देश के सभी नागरिकों के हित में संविधान की रक्षा सदैव अपेक्षित है।
भारतीय संविधान के भाग ४ के अनुच्छेद ४४ के अनुसार, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत को सभी धर्मों और उनके अनुयायियों की समानता के स्वरूप में लागू होना अपेक्षित है। इन कानूनों में हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, तलाक अधिनियम, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम इत्यादि शामिल है। इसी बीच शरिया कानून जैसे भी जोकि धार्मिक ग्रंथों और व्याख्या ऊपर पूर्णत आधारित है, भी लागू होता आया है।
समान नागरिक संहिता प्रस्तावों में एक विवाह, पैतृक संपत्ति की विरासत पर बेटे और बेटी के लिए समान अधिकार, और वसीयत, दान, देवत्व, संरक्षकता और हिरासत के बंटवारे के संबंध में लिंग और धर्म तटस्थ कानून शामिल हैं।
देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने के लिए अति आवश्यक है। जबकि आलोचक इसे धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ख़तरा बताकर इसका विरोध करते रहते हैं। गोवा राज्य सन 1961 से समान नागरिक संहिता का पालन करता आ रहा है।
वाकई में समान नागरिक संहिता लागू करने से विभिन्न समुदायों में सभी लिंगों के लिए समानता और न्याय को बढ़ावा ही मिलेगा
(यह लेखिका के निजी विचार है)
Sumita Bhinchar, MAKRANA
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